दिल्ली से देहरादून का सफर अब सिर्फ ढाई घंटे में हो सके — यही सपना था ₹12,000 करोड़ के Delhi Dehradun Expressway का। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन भी कर दिया। लाखों लोग इस रोड का इंतजार कर रहे थे। लेकिन इस शानदार हाईवे पर एक अजीब बाधा आ खड़ी हुई एक पुराना घर, जिसका नाम है “स्वाभिमान”। अगर आप यह जानना चाहते हैं कि आखिर एक अकेला घर इतने बड़े एक्सप्रेसवे को कैसे रोक सकता है, तो यह पोस्ट आपके लिए बेहद जरूरी है।
यह Case क्यों है Important आपके लिए?
इस मामले से आप समझ सकते हैं कि जमीन अधिग्रहण (land acquisition) में अगर मुआवजा सही न मिले, तो आम आदमी भी सरकार के सामने खड़ा हो सकता है। यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है — यह उन लाखों लोगों की कहानी है जिनकी जमीन सरकारी प्रोजेक्ट्स के लिए ली जाती है। साथ ही, यह जानना जरूरी है कि देश के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में कानूनी लड़ाई (legal dispute) किस तरह काम करती है।
कहाँ है यह घर और क्या है इसकी कहानी?
यह घर है मंडोला गाँव में, दिल्ली-गाजियाबाद बॉर्डर के पास। घर का नाम है “स्वाभिमान” और यह लगभग 1600 वर्ग मीटर में फैला हुआ है।इस घर के मालिक थे डॉ. वीर सिंह सरोहा, जो साल 2016 में गुजर चुके हैं। अब यह जमीन उनके पोते लक्ष्यवीर सरोहा के नाम है।
1998 से शुरू हुई है यह लड़ाई
यह झगड़ा कोई नया नहीं है। इसकी जड़ें 1998 में हैं उस वक्त UP Housing Board ने मंडोला के पास 6 गाँवों की करीब 2,614 एकड़ जमीन लेने का फैसला किया। मंडोला हाउसिंग स्कीम के लिए सरकार ने ₹1,100 प्रति वर्ग मीटर का मुआवजा देने की बात कही।
बाकी किसानों और जमीन मालिकों ने यह मुआवजा मान लिया। लेकिन डॉ. वीर सिंह सरोहा ने मना कर दिया। उनका कहना था — यह कीमत बहुत कम है। वे इलाहाबाद हाई कोर्ट चले गए और कोर्ट ने उनकी जमीन के अधिग्रहण पर रोक लगा दी मंडोला हाउसिंग स्कीम कभी पूरी नहीं हो पाई।
2020 में NHAI आया, तब फिर बात अटकी
साल 2020 में NHAI (नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया) को Delhi-Dehradun Expressway के लिए इसी जमीन की जरूरत पड़ी खासकर एक सर्विस रोड रैंप बनाने के लिए, जो देहरादून से आने वाली गाड़ियों को मंडोला की तरफ उतरने में मदद करती। Housing Board ने वह जमीन NHAI को दे दी। लेकिन उस जमीन पर सरोहा परिवार का कानूनी विवाद अभी भी चल रहा था।
Supreme Court तक पहुँचा मामला
2024 में लक्ष्यवीर सरोहा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। उन्होंने कहा कि यह जमीन Housing Board को देना ही गलत था सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया यथास्थिति बनाए रखो न घर तोड़ो, न निर्माण करो। साथ ही मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में जल्दी सुलझाने को कहा गया।
आज की हालत क्या है?
आज जब आप उस एक्सप्रेसवे पर जाते हैं तो देखते हैं कि मेन हाईवे बन गया है, गाड़ियाँ दौड़ रही हैं। लेकिन जहाँ स्वाभिमान घर है, वहाँ की सर्विस रोड अधूरी रह गई है। घर के चारों तरफ खुदाई की मिट्टी पड़ी है। सर्विस रोड वहाँ आकर अचानक बंद हो जाती है। कोई चेतावनी का बोर्ड नहीं, जिससे रात को वहाँ एक्सीडेंट का खतरा बना हुआ है।
घर में एक चौकीदार जयपाल सिंह रहते हैं जो घर की देखभाल करते हैं। असली मालिक नोएडा में रहते हैं।
परिवार की माँग क्या है?
परिवार का साफ कहना है — आज की जमीन की कीमत के हिसाब से मुआवजा दो। चौकीदार के अनुसार मालिक कम से कम ₹35 करोड़ चाहते हैं। सरकार की तरफ से जो पुराना रेट था वह जमाने पुराना था करीब ₹27,000 प्रति बीघा जो आज के समय में बेहद कम है।
आगे क्या होगा?
मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है। जब तक कोर्ट का फैसला नहीं आता, न घर हटेगा, न सर्विस रोड बनेगी। देश के सबसे बड़े एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट्स में से एक — ₹12,000 करोड़ का यह हाईवे एक पुराने मुआवजा विवाद की वजह से अधूरा खड़ा है।
Conclusion
“स्वाभिमान” घर की यह कहानी सिर्फ एक परिवार की जिद की कहानी नहीं है यह उस सिस्टम की कहानी है जिसमें जमीन लेते वक्त लोगों को उचित दाम नहीं दिया जाता। जब तक सरकार और परिवार के बीच कोई सही हल नहीं निकलता, तब तक यह एक्सप्रेसवे पूरी तरह काम नहीं कर पाएगा।
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