किसान पैदावार की होड़ में रासायनिक खादों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन क्या आपको पता हैं कि यह चमकती हुई फसलें आपकी मिट्टी की सेहत को अंदर ही अंदर खोखला कर रही है ये रासायनिक खादों के असंतुलित और अत्यधिक प्रयोग से न केवल मिट्टी की उर्वरक क्षमता घट रही है, बल्कि जमीन में मौजूद मित्र कीट भी मर रहे हैं।
गाजीपुर के पीजी कॉलेज स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. ओमकार सिंह ने इस गंभीर समस्या पर चिंता व्यक्त करते हुए किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण परामर्श जारी किया है। उनके अनुसार, अगर अब भी सावधानी नहीं बरती गई, तो उपजाऊ भूमि जल्द ही बंजर होने की कगार पर पहुँच सकती है। इसका सबसे प्रभावी समाधान ‘हरी खाद’ (Green Manure) का उपयोग है।
रासायनिक खादों का दुष्प्रभाव और घटती पैदावार
डॉ. ओमकार सिंह बताते हैं कि लगातार ऐसी फसलें उगाने से जो जमीन से अधिक पोषक तत्व खींचती हैं और साथ में यूरिया व डीएपी जैसे रसायनों के गलत इस्तेमाल से मिट्टी का जैविक कार्बन (Organic Carbon) न्यूनतम स्तर पर पहुँच गया है जैविक कार्बन की कमी का सीधा मतलब है कि मिट्टी अब “सांस” नहीं ले पा रही है, जिससे फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर बुरा असर पड़ रहा है।
किसान भाई अक्सर अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में मिट्टी के स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन बिना स्वस्थ मिट्टी के लंबे समय तक टिकाऊ खेती सतत कृषि करना नामुमकिन है।
हरी खाद: मिट्टी के लिए है सोना
भूमि में जीवांश बढ़ाने और उसे दोबारा जीवित करने के लिए हरी खाद से बेहतर और सस्ता कोई विकल्प नहीं है। डॉ. सिंह के अनुसार, हरी खाद न केवल मिट्टी की संरचना में सुधार करती है, बल्कि यह पौधों के लिए आवश्यक नाइट्रोजन की प्राकृतिक रूप से पूर्ति भी करती है।
हरी खाद के मुख्य फायदे:
- नाइट्रोजन का प्राकृतिक स्रोत: ढैंचा और सनई जैसी फसलों की जड़ों में ऐसी ग्रंथियां होती हैं जो हवा से नाइट्रोजन लेकर जमीन में जमा करती हैं।
- मिट्टी की जल धारण क्षमता: इसके प्रयोग से मिट्टी में नमी सोखने की शक्ति बढ़ती है, जिससे सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती है।
- जैविक खाद की बचत: हरी खाद का उपयोग करने के बाद अगली फसल में रासायनिक खादों की जरूरत 25 से 30 प्रतिशत तक कम हो जाती है।
- मिट्टी की संरचना: यह भारी मिट्टी को भुरभुरा बनाती है और हल्की रेतीली मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करती है।
कैसे करें हरी खाद का प्रयोग?
हरी खाद तैयार करना बेहद आसान है। इसके लिए किसान भाई ढैंचा, सनई, लोबिया या ग्वार जैसी फसलों का चुनाव कर सकते हैं।
- बुवाई का समय: आमतौर पर अप्रैल के आखिरी हफ्ते से लेकर मई के महीने में इसकी बुवाई करना सबसे अच्छा रहता है।
- मिट्टी में मिलाना: जब फसल 45 से 50 दिन की हो जाए या उसमें फूल आने शुरू हों, तब उसे रोटावेटर या हल की मदद से मिट्टी में ही जोत देना चाहिए।
- सड़न प्रक्रिया: जोतने के बाद खेत में थोड़ा पानी भर देना चाहिए ताकि पौधे अच्छी तरह गलकर खाद में बदल जाएं। इसके लगभग 10 से 15 दिन बाद आप धान या अन्य फसलों की रोपाई कर सकते हैं।
कृषि वैज्ञानिकों का निष्कर्ष
डॉ. ओमकार सिंह का कहना है कि स्वस्थ धरा से ही स्वस्थ फसल संभव है। “हरित क्रांति” के बाद मिट्टी पर बढ़ा दबाव अब दिखने लगा है। ऐसे में किसानों को अब प्राकृतिक खेती (Natural Farming) और हरी खाद जैसे पारंपरिक तरीकों की ओर लौटना होगा। इससे न केवल खेती की लागत कम होगी, बल्कि उपभोक्ताओं को रसायन मुक्त और शुद्ध अनाज भी मिल सकेगा।

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